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Sunday, 11 February 2024

संतान - सुख, सुरक्षा उसका चरित्र और मनुष्य के कर्म भाग -२


                   संतान - सुख, सुरक्षा उसका चरित्र और मनुष्य के कर्म

                                                                    श्री कृष्ण सार 

                  श्री कृष्णके मधुर बोल एवम वचन - SHREE KRISHNA SEEKH भाग -

                            संतान - सुख, सुरक्षा उसका चरित्र और मनुष्य के कर्म

  !! संतानो के भविष्य को सुख से भरणे का प्रयत्न करना यही हर माता- पिता का प्रथम कर्तव्य होता है !!

!! जिन्हें आप इस संसार में लाये, और जिनके कर्मो से ये जगत आपक भी परिचय पायेगा भविष्य में उनके               भविष्य कि सुख कि योजना करणे से अधिक महत्व और हो भी क्या सकता है !!

                                  किंतु सुख और सुरक्षा क्या ये मनुष्य के कर्म से प्राप्त नही होते. ?


माता - पिता के दिये हुए अच्छे या बुरे संस्कार, उनकी दि हुई योग्य अथवा अयोग्य शिक्षा क्या आज के सारे कर्मो का मोल नही.

                                         संस्कार और शिक्षा से बनता है मनुष्य का चरित्र.

                                                                    अर्थात 


!!! माता - पिता अपने संतानो का जैसा चरित्र बनाते है, वैसा ही बनता है उनका भविष्य, किंतु फिर भी अधिकतर माता- पिता अपनी संतानो का भविष्य सुरक्षित करने कि चिंता में उनका चरित्र निर्माण का कार्य भूल ही जाते है. !!!

                                                                    वस्तुतः 

!! जो माता- पिता अपने संतानो कि भविष्य कि चिंता करते है !! उनकी संतानो को कोई लाभ नही होता. !! किंतु जो माता- पिता अपने संतानो के भविष्य का नही उनके चरित्र का निर्माण करते है !! ऊन संतानो कि प्रशस्ती समस्त संसार करता है !!


                                                  !!! स्वयंम विचार किजीये !!!


मुझे नयी धारावाहिक स्टार प्लस पर नये सिरे से प्रसारित कि गई महाभारत गाथा और इसमे से सारे पात्र उनके संघर्ष कि कहाणी पुन्हा पुन्हा सुनने का अवसर मिला. 

श्री. कृष्ण भगवान (सौरभ जैन जी उनका एक यादगार अजरामर किरदार ) उनके इस किरदार ने मुझपर कुछ ऐसा असर किया  कि मैने सारे महाभारत के एपिसोड पुन्हा पुन्हा सुनकर उसमे से मेरे सबसे अधिक प्रिय पात्र श्री. कृष्ण भगवान के लगभग सारे डायलॉग एक डायरी में लिख लिये ताकी जब भी कभी मुझे अकेलापण महसूस हो, मेरी सोच  नकारात्मकता से भर जाये तब मे श्री. कृष्ण भगवान के इन्ही मधुर बोल एवंम वचन को पढकर पुन्हा मेरी उर्जा एक जगह केंद्रित करके मेरे जीवन का लक्ष्य हासील कर सकू.  

बस यही विचार के साथ मेने मेरे अपने डायरी में लिखे वो सारे डायलॉग जो कि स्टार प्लस (Star plus) और  डिस्ने +  हॉट स्टार (Dinsey + Hotstar) पर १६ सप्टेंबर २०१३ से १६ ऑगस्ट २०१४ में प्रदर्शित कि गयी महाभारत  गाथा कि पेशकश हे उन्हे यहा पर पुन्हा एक बार जैसे शब्द है वैसे ही लिखणे कि कोशिश कि है.

सिद्धार्थ कुमार तिवारी और अन्य लिखित, अमोल सुर्वे, सिद्धार्थ कुमार आनंद और अन्य द्वारा निर्देशित ये श्री. व्यास जीं कि महाभारत गाथा के श्री कृष्ण भगवान के मुख से निकले कुछ सवांद आपके लिये.  

NO COPYRIGHT INFRIDGEMENT INTENDED. THE CLIPS, CONTENT AND AUDIO CREDIT GOES TO THEIR RESPECTIVE OWENRS. WE USED HERE FOR MOTIVATION KNOWLEDGE, SPRITUALITY PURPOSE.

Tuesday, 24 October 2023

क्या इच्छा, आशा, अपेक्षा, आकांशा यही सब मानव समाज के चालक होते है ?

 

                                                                  श्री कृष्ण सार 

                                     श्री कृष्णके मधुर बोल एवम वचन - भाग -१

                इच्छा, आशा, अपेक्षा, आकांशा यही सब मानव समाज के चालक होते है ! 

                                                                    नही ?


                                               यदि कोई आप से पुछे, की आप कौन है ? 

                                                       तो आपका उत्तर क्या होगा ..?

                     आप तुरंत ही ये  जान जाएगें की आपकी इच्छाये ही आपके जीवन कि व्याख्या है.

                   कुछ पाने से मिली सफलता कुछ ना पाने से मिली निष्फलता ही आपका परिचय है 

अधिकतर लोग ऐसे जीते है, की स्वयंम भीतर से मरते रेहते है लेकिन अपनी इच्छाओ को नही मार पाते.

                        इच्छाए उन्हें दोडाती है, जिस प्रकार म्रिकृष्णा मृग को दौड़ाती है।  

                                परंतु इन्ही इच्छाओ कि गर्भ में ज्ञान का प्रकाश भी है. 

                                                                    कैसे ..?

जब इच्छाये अपूर्ण रहती है, तुटती है, तब वहिसे ही ज्ञान की किरण प्रवेश करती है मनुष्य के हृदय में.

                                                                     ना

                                                            ये कथा नहीं है 

                                                 केवल इच्छाओं के संघर्ष की, 

                नही है केवल महत्वाकांशाओ से जन्म लेने वाले भयावह रक्तपात की, ये कथा है, 

                                        इच्छाओं के गर्भ से उदित होते हुए ज्ञान की।

                 
                        मै वासुदेव कृष्ण आप सभी को निमंत्रण देता हूँ। इस यात्रा पे चलने का.

                                जीवन का मर्म सिखायेगी, मनुष्य का धर्म सिखाएगी, 

                                   किचड से उठकर कमल बनने का कर्म सिखाएगी. 


                                                    और इस यात्रा का नाम 

                                                        !!! "महाभारत" !!!


मुझे नयी धारावाहिक स्टार प्लस पर नये सिरे से प्रसारित कि गई महाभारत गाथा और इसमे से सारे पात्र उनके संघर्ष कि कहाणी पुन्हा पुन्हा सुनने का अवसर मिला. 

श्री. कृष्ण भगवान (सौरभ जैन जी उनका एक यादगार अजरामर किरदार ) उनके इस किरदार ने मुझपर कुछ ऐसा असर किया  कि मैने सारे महाभारत के एपिसोड पुन्हा पुन्हा सुनकर उसमे से मेरे सबसे अधिक प्रिय पात्र श्री. कृष्ण भगवान के लगभग सारे डायलॉग एक डायरी में लिख लिये ताकी जब भी कभी मुझे अकेलापण महसूस हो, मेरी सोच  नकारात्मकता से भर जाये तब मे श्री. कृष्ण भगवान के इन्ही मधुर बोल एवंम वचन को पढकर पुन्हा मेरी उर्जा एक जगह केंद्रित करके मेरे जीवन का लक्ष्य हासील कर सकू.  

बस यही विचार के साथ मेने मेरे अपने डायरी में लिखे वो सारे डायलॉग जो कि स्टार प्लस (Star plus) और  डिस्ने +  हॉट स्टार (Dinsey + Hotstar) पर १६ सप्टेंबर २०१३ से १६ ऑगस्ट २०१४ में प्रदर्शित कि गयी महाभारत  गाथा कि पेशकश हे उन्हे यहा पर पुन्हा एक बार जैसे शब्द है वैसे ही लिखणे कि कोशिश कि है.

सिद्धार्थ कुमार तिवारी और अन्य लिखित, अमोल सुर्वे, सिद्धार्थ कुमार आनंद और अन्य द्वारा निर्देशित ये श्री. व्यास जीं कि महाभारत गाथा के श्री कृष्ण भगवान के मुख से निकले कुछ सवांद आपके लिये.  

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Thursday, 30 July 2020

गोष्ट सहनशीलता आणि सहिष्णुतेची


गोष्ट सहनशीलता आणि सहिष्णुतेची

मस्त गोष्ट आहे कदाचित तुमच्या ऐकण्यात किंवा वाचनात आली असेल...




एका बेडकाला कोमट पाण्यात ठेवण्यात आले. अपेक्षा होती की बेडूक टुणकन उडी मारून बाहेर येईल.

पण तसे काही झाले नाही. मग हळू हळू ते पाणी गरम करण्यात येऊ लागले.

जसजसे पाण्याचे तापमान वाढू लागले, आतातरी बेडूक टुणकन उडी मारून बाहेर येईल असे वाटू लागले. पण तसे काही घडेना

शेवटी पाणी उकळू लागले तरी पण बेडूक बाहेर येईना. शेवटी त्या बेडकाला जेव्हा उकळत्या पाण्यातून बाहेर काढले तेव्हा तो बेडूक मेलेला आढळला.

तुम्हाला वाटेल की बेडूक उकळत्या पाण्यामूळे भाजून मेला.

पण तसे नव्हते...!!!



पाण्याच्या तापमानाप्रमाणे आपल्या शरीराचे तापमान ऍडजेस्ट करायची एक खास देणगी बेडकाला मिळाली आहे.

कारण बेडूक ज्या पाण्यात रहातो त्याचे तापमान नेहमीच कमी जास्त होत असते. बेडकाला कोमट पाण्यात टाकल्यावर बेडकाने आपल्या शरीराचे तापमान पाण्याच्या तापमानाप्रमाणे ऍडजेस्ट करायला सुरवात केली.

पुढे जस जसे पाण्याचे तापमान वाढू लागले बेडकाने तोच प्रयोग चालु ठेवला. पण यामध्ये बेडकाची बरीच ताकद खर्च झाली.

ज्यावेळी पाणी उकळू लागले व बेडकावर टुणकन उडी मारून पाण्याबाहेर पडण्याची वेळ आली तेव्हा उडी मारायला बेडकाकडे ताकदच शिल्लक राहीली नाही.

त्यामुळे बेडकावर मरण ओढवले. जर ज्या वेळी ताकद होती त्यावेळी बेडूक उडी मारून बाहेर पडला असता तर नक्कीच वाचला असता.

आपले पण असेच असते. आपण अनेकवेळा संकटे, अडथळे, अडचणी, दुःख, उदासीनता, स्वप्नभंग, निराशा यामूळे वेढले गेलेलो असतो. तसेच आपल्याला पुष्कळवेळा आपल्याला कमी लेखणारी, आपला अपमान करणारी, आपले शारिरीक, मानसीक, भावनीक व आर्थिक शोषण करणारी माणसे भेटत असतात.

अशा परिस्थितीला व माणसांना तोंड देण्यासाठी निसर्गाने आपल्याला एक आगळी वेगळी शक्ती बहाल केली आहे. ती म्हणजे सोशीकता, सहन करण्याची ताकद किंवा सहिष्णुता. आपण नेहमीच आलेल्या परिस्थितीला ऍडजेस्ट व्हायचा प्रयत्न करत असतो.

उगीच कशाला वाकड्यात शिरायचे...; म्हणून आपल्याला जी वेडी- वाकडी माणसे भेटत असतात, त्यांच्याशी पण आपण ऍडजेस्ट करायचा प्रयत्न करत असतो.

खरे म्हणजे यातून लवकर सुटका कशी करून घेता येईल याचे मार्ग आपल्याला दिसत असतात व समजत पण असतात. पण सहिष्णुतेच्या नावाखाली आपण याकडे दुर्लक्ष करत असतो.

पण यामध्ये आपली बरीच ताकद खर्च होत असते हे आपल्याला कळत नसते. पण जेव्हा डोक्यावरून पाणी वाहू लागते व यातून आपली सुटका करून घेण्याची वेळ येते तेव्हा सुटका करून घेण्यासाठी लागणारी ‘एनर्जी’ च आपल्याकडे शिल्लक रहात नाही.

आपण मग त्यात कायमचे अडकून पडतो व "दैवाला" दोष देण्यापलीकडे फारसे काही करू शकत नाही.

सहनशिलता किंवा सहिष्णुता हा चांगला गुण आहे पण त्याचा अतीरेक झाला तर तो दुर्गुणच ठरतो.

गुणांचे सद्गुण व दर्गुण असे दोन प्रकार आहेत. पण अनेक वेळा दुर्गुण हे सद्गुण ठरत असतात; तर सद्गुण हे दुर्गुण ठरत असतात.

तुम्ही कोणालाही तुमचे शारिरीक, मानसीक, भावनीक व आर्थिक शोषण करू देऊ नका.

पाणी गरम होत असताना जोपर्यंत आपल्याकडे उडी मारून बाहेर पडण्याची ताकद आहे तोपर्यंत उडी मारून बाहेर पडणे शहाणपणाचे ठरते.

तात्पर्य : तुमच्याकडे असलेल्या सहनशीलतेचा किंवा सहिष्णुतेचा उपयोग कसा करायचा हे तुमचे तुम्हीच ठरवायचे

Sunday, 2 December 2018

BE THE CEO OF YOUR OWN LIFE

दिनांक :- ०२-१२-२०१८

अप्रतिम लेख नक्की वाचा आणि वाचल्यानंतर जर तुम्हाला तुमच्या आयुष्यात काही बदल करावासा वाटला तर नक्कीच करा..

मी तर म्हणतो बघा वाचून एकदा हा लेख नक्कीच फरक पडेल तुमच्या आयुष्यात कदाचित हा लेख तुमच्या ही वाचनात याआधी आला असेलही तरीपण पुन्हा एकदा माज्या वाचनात आलेला हा लेख तुम्हा सर्वांसाठी :-


                                              !!! BE THE CEO OF YOUR OWN LIFE !!!




दोन दिवसापुर्वीची गोष्ट कुटुंबासह कुठल्यातरी मॉल मध्ये होतो. मुलगा 'प्ले झोन' मध्ये, सौ. (विन्डो) शॉपिंगमध्ये आणि मी एसीची छान गार हवा अंगावर घेत एका कोपऱ्यात पेपर वाचत बसलो होतो. पेपर खर तर नावाला. माणसं वाचत बसलो होतो. विविध चेहऱ्यांची, आकारांची माणसं जणू 'आज' जगाचा शेवटचा दिवस असावा' असे भाव आणुन शॉपिंग करत होती. (एवढ्या वस्तु विकत घेऊन त्या वस्तु माणसं घरात कुठे ठेवतात, हा मध्यम वर्गीय प्रश्न मला कायम सतावतो. असो.)


माझं 'माणसं-वाचन' चालु असतानाच माज्या शेजारी एक तरुण येऊन बसला. जेमतेम चाळीसीचा असावा. जीन्स आणि खोचलेला टी-शर्ट, पायात बुट, अंगावर बुट, हातात मराठी पुस्तक, खिशातला शुभ्र रुमाल काढुन त्याने कपाळावरचा घाम पुसला. रुमालाची (होती तशी) व्यवस्थित घडी घातली आणि त्याचं खिशात ठेवली. त्याच्या हालचाली शांत झाल्यावर त्याने पुस्तक उघडले. ते पुस्तक माज्या आवडत्यांपैकी एक होतं. न राहवून मी म्हंटल, मस्त पुस्तक आहे.' त्याने माज्याकडे बघुन हसत मान हलवली.

पाच एक मिनिटांनी तो माज्याकडे वळुन म्हणाला, 'वाचन आवडतं..?'
'प्रचंड. रीडिंग इज माय फर्स्ट लव्ह,' आजूबाजूला 'सौ' नाही हे बघत मी म्हटलं.

'किती वाजता रोज...?'

'रोज असं नाही... अं...काही खास असं ठरवलेलं नाही. इच्छा झाली कि वाचतो.' अनपेक्षित योर्करला कसं बसं खेळत मी म्हटल.

खायला आवडतं? कॉनजीक्यूटिव्ह यॉर्कर.
प्रचंड इटिंग इज माय सेकंड लव्ह.'

हो.' मग रोज जेवता की इच्छा होईल तेव्हा...??
'नाही नाही... रोज दोन वेळा.. आणि मध्ये मध्ये काही ना काही खादाडी चालु असतेच.' हिट विकेट !

तो तरुण हसला आणि म्हणाला मी दिवस भरात एक तास वाचतो. वाचल्याशिवाय झोपत नाही. अंघोळ जेवण तसच वाचन...!!



'बरा वेळ मिळतो तुम्हाला.' दयनीय चेहरा करत मी म्हटलं.

त्यावर तो तरुण म्हणाला:
वेळ मिळत नाही, मी काढतो. तसाही 'वेळ' ही जगातली सगळ्यात टेकन फॉर ग्रांटेड गोष्ट आहे असं मी मानतो. फॉर दॅट मॅटर, आयुष्यच घ्या ना ! फारच गृहीत धरतो आपण आयुष्याला ! 'मी' रिटायर झाल्यावर भरपुर वाचन करणारे' असं कोणी म्हंटल ना, की माझी खात्री आहे की, नवज्योत सिंग सिद्धुसारखा रेड्यावर हात आपटत तो 'यम हसत असेल' !

मी हसलो तसं किंचित गंभीर होत त्याने विचारल, 'तुम्ही कधी पाहिलंय यमाला..?'

मी आणखी हसु लागलो.
'आय एम प्रीटी सिरीयस. तुम्ही पाहिलंय यमाला..?
मी म्हणालो हो, दोन वर्षापुर्वी. रस्ता क्रॉस करत होतो. समोरून भरगाव गाडी आली, त्या दिव्यांच्या प्रकाश झोतातही मी अंधार पहिला. त्या दोन सेकंदात मला मृत्यूने दर्शन दिलं. त्या नंतर जागा झालो ते हॉस्पिटल मध्येच. गंभीर इजा होऊन सुद्धा मी कसाबसा वाचलो होतो. हॉस्पिटल मधुन घरी आलो ते नवा जन्म घेऊन. 'मी' देव पहिला नव्हता पण 'मृत्यू' पहिला होता. मृत्यू तुम्हाला खुप शिकवतो.

माझी मृत्यूवर श्रद्धा जडली. आजूबाजूला रोज इतके मृत्यू दिसत असूनही 'मी' अमर राहणार असं ज्याला वाटतं, तो माणुस ! तुम्हाला माहितीय, माणुस मृत्यूला का घाबरतो..?

'अर्थात' ! मृत्युनंतर त्याचे सगे सोयरे कायमचे दुरावतात. मृत्युमुळे माणसाच्या इच्छा अपुर्ण राहतात.'

मी म्हटलं. साफ चूक, माणूस यासाठी घाबरतो कारण मृत्युनंतर 'उद्या' नसतो !'
'मी समजलो नाही.'

'प्रत्येक काम आपल्याला उद्यावर टाकायची सवय असते. वाचन, व्यायाम, संगीत ऐकणे.. गंमत म्हणजे आहेत ते पैसे सुद्धा आपण आज उपभोगत नाही. ते कुठेतरी गुंतवतो. भविष्यात 'डबल' होऊन येतील म्हणुन !
या उद्या वर आपला फारसा भरवसा नसतो. पण तो आपल्या जगण्याचा एक भाग बनतो. आपण मृत्यूला घाबरतो कारण मृत्यू आपल्याला उद्या बघायची संधी देत नाही. !मृत्यू म्हणजे- आहोत तिथे, आहोत त्या क्षणी फुल  स्टॉप ! म्हणजे खेळ ऐन रंगात आलेला असताना कुणीतरी येऊन तुम्हाला खेळाच्या बाहेर काढाव, तसा मृत्यू तुम्हाला या जगातून घेऊन जातो. तुमच्यावरील या 'अन्यायाविरुद्ध' आवाज उठवायला सुद्धा तुम्ही उरत नाही. माज्या मृत्यू नंतर मी माजा 'लाडका' उद्या पाहु शकणार नाही, या हतबलतेला मनुष्य जास्त घाबरतो. म्हणुन मी हॉस्पिटल मधुन घरी आल्यावर ठरवलं. या पुढंच आयुष्य उघड्या डोळ्यांनी जगायचं. इतके दिवस जेवण नुसतेच 'गिळल'. यापुढे एकेका घासाची मजा  घ्यायची. आयुष्याची माजा घेत जगायचं.'

'म्हणजे तुम्ही नक्की काय केलं ..? माझी उस्तुकता आता वाढली होती. 
'माज्या आयुष्याची जबाबदारी मी स्वतःवर घेतली. मी माज्या आयुष्याचा CHIEF EXECUTIVE OFFICER झालो !'

कंपनीचा सी. ई. ओ. वैगरे इतपर्यंत ठीक आहे. आयुष्याचा 'सी. ई. ओ. वैगरे.. जरा जास्तच होत नाही का..? मी विचारलं.

'वेल... तुम्हाला काय वाटतं हे माज्यासाठी महत्वाच नाही. आयुष्य कसं जगायचं याचे नियम मी माज्यापुरते केलेत. त्यामुळे..'

'मग तुमच्या कंपनीत किती माणसं आहेत..? त्याला मध्येच तोडत, मस्करीच्या सुरात मी विचारलं, म्हटलं तर खुप, म्हंटल तर कोणीच नाही.' तो खांदे उडवत म्हणाला.

मला न कळल्याच पाहुन तो पुढे बोलु लागला. 'मी फक्त माज्या बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स सोबत दिल करतो. दे व्हर्चुअली कंट्रोल माय लाईफ. 
माज्या बोर्डवर विविध माणसे आहेत. फरहान अख्तर, शिवाजी महाराज, अब्दुल कलाम, चार्ली चॅप्लीन, गांधीजी, अमिताभ, हेलन केलर, जे आर डी टाटा....'



माज्या चेहऱ्यावरील बदलत जाणारे भान न्याहाळत त्याने आणखी काही नावे घेतली.   

या लोकांबद्दल वाचलं तेव्हा एक लक्षात आलं. या प्रत्येकामध्ये काहीना काही वैशिष्ट्य आहे. काही क्वालिटीजमुळे मला ही माणसं ग्रेट वाटतात. मी काय करतो…अं…उदाहरण देतो…समजा खोटं बोलण्यावाचून पर्याय नाही अशा परिस्थितीत सापडलो की माझे ‘एथिक्स डायरेक्टर’ गांधीजींना विचारतो, काय करू? मग ते सांगतील ते करतो. व्यायाम करायला जाताना सकाळी उठायचा कंटाळा आला तर माझे ‘हेल्थ डायरेक्टर’ फरहान अख्तर मला काय म्हणतील, या विचाराने मी उठून बसतो आणि व्यायाम करायला जातो. कधीतरी काहीतरी घडतं आणि खूप निराश वाटतं. मग माझ्या ‘इन्स्पीरेशन डायरेक्टर’ हेलन केलरना पाचारण करतो. त्यांना भेटून आपल्या अडचणी फारच मामुली वाटू लागतात. कधी दुःखी झालो तर ‘इंटरटेनमेंट डायरेक्टर’ चार्ली चॅप्लीन भेटायला येतात…’


माझ्या चेहऱ्यावरील विस्मयचकित भाव पाहून तो म्हणाला..’मला माहितीय की ऐकायला हे सगळं विचित्र वाटत असेल. पण एक गोष्ट सांगतो. आयुष्य जगणं ही जर परीक्षा असेल, तर प्रत्येक माणसाने स्वतःचा ‘सीलॅबस’ बनवावा हे उत्तम ! आपण अनेकदा ‘इतरांप्रमाणे’ आयुष्य जगायचा प्रयत्न करतो आणि तिथेच फसतो. जगायचं कसं? या प्रश्नावर चिंतन करणारी लाखो पुस्तके आज बाजारात आहेत. 
हजारो वर्षे माणूस या प्रश्नाचं उत्तर शोधतोय. गौतम बुद्धांनी मात्र फक्त चार शब्दांत उत्तर दिलं -Be your own light. मला तर वाटतं, याहून सोपं आणि याहून कठीण स्टेटमेंट जगात दुसरं नसेल !’
मी त्या तरुणाला नाव विचारलं. त्याने सांगितलं. आम्ही एकमेकांचा निरोप घेतला.
चार पावलं चालून गेल्यावर तो तरुण पुन्हा वळून माझ्याकडे आला. म्हणाला, ‘सगळ्यात महत्वाचं सांगायचं राहिलं.
मी एका अॅक्सिडेंटमध्ये वाचलो आणि इतकं काही शिकलो. तुम्ही…प्लीज..कुठल्या अॅक्सिडेंटची वाट पाहू नका !’ आम्ही दोघेही हसलो.
अपघात फक्त वाहनांमुळेच होतात, असं थोडीच आहे? ओळखपाळख नसलेला तो तरुणही अपघातानेच भेटला की !


घरी जायला आम्ही रिक्षात बसलो. ‘प्ले झोन’मध्ये खेळून पोरगं आधीच दमलं होतं. वाऱ्याची झुळूक रिक्षात येऊ लागली. मांडीवर बसल्या बसल्या मुलगा झोपून गेला होता. त्याच्या मऊ मऊ केसांमधून हात फिरवताना संध्याकाळच्या गप्पा आठवत होत्या.
मनात आलं, ‘आपल्या पोराने जर असे ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ नेमले, तर त्यात ‘त्याचा बाप’ असेल का?’
परवाच्या रात्री बराच वेळ जागा राहिलो.
कोण जाणे, कदाचित हाच प्रश्न यापुढील आयुष्य ‘चवीने’ जगत राहायची उर्जा देत राहील !

प्रत्येकाने वाचावा असा नविन काळेंचा अप्रतिम लेख.



Saturday, 21 April 2018

थेंबे थेंबे तळे साचे सुखाचा मुलमंत्र वाचाच एकदा ...

दिनांक :- २१.०४.२०१८

थेंबे थेंबे तळे साचे सुखाचा मुलमंत्र वाचाच एकदा ...
काही छोट्या छोट्या गोष्टींच्या स्वरूपात:-



कथा नंबर एक:-

"सुप्रसिद्ध कारखानदार हेन्री फोर्ड" यांच्या घरातील भिंतीवर एक फोटो होता, त्यात ते एका गरीब व्यक्तीला आलिंगन देत आहेत असे दृश्य होते. बरेच दिवस हा फोटो त्यांच्या घरात पाहिल्यानंतर एक दिवस त्यांच्या चिटणीसाने त्यांना सर ही फोटोतील व्यक्ती कोण आहे ? असे विचारले.

त्यावर हेन्री फोर्ड म्हणाले हा माजा वर्गमित्र आहे. 

यावर आश्चर्य चकित होऊन चिटणीसाने पुन्हा विचारले... मग सर दोघांमध्ये एवढा फरक कसा..??

त्यावर हेन्री फोर्ड म्हणाले "आम्ही दोघांनी कमाईस एकत्रच सुरुवात केली. त्याने मात्र कमाई पेक्षा जास्त खर्च करायला सुरुवात केली. तर मी त्याच दिवसापासून "थोडी-थोडी बचत करायला सुरुवात केली." 

आज साध्या असेच एक उदाहरण आपल्याला आपल्या भारत देशात पाहायला मिळते. भारताचा लिटील मास्टर सचिन तेंदुलकर आणि एक उत्कृष्ट क्रिकेट पटू न बनू शकलेला त्याचाच एक वर्गमित्र विनोद कांबळी. दोघेही एकाच शाळेतील, एकाच वर्गातील दोघांचीही क्रिकेट उत्तम, मग असे काय झाले की विनोद कांबळी हा क्रिकेट पासुन दूर गेला....

एक वेळ तर अशी होती की त्याच्याकडे घर असुन सुद्धा घराचा मेंटेनन्स भरायला पैसे नव्हते आणि याउलट सचिन हा उत्तम क्रिकेट खेळतच गेला श्रीमंत तर झालाच पण प्रामाणिक पणा आणि नम्रपणाने त्याने सर्वांना आपलेसे केले. काहीजण तर असेही म्हणतात की विनोद कांबळी हा सचिन पेक्षा उत्तम क्रिकेट खेळायचा, विनोदही भारता साठी क्रिकेट खेळला पण प्रचंड ग्ल्यामर, पैसा पटकन आलेली श्रीमंती याने तो भुलला त्याला ते टिकवता आले नाही. अय्याशी, एशाराम अश्याने क्रिकेट पासुन तो दूर गेला आणि दोन मित्रांमध्ये खुप अंतर निर्माण झाले.

सचिन ने त्याला मदत केलेही पण त्याचीही त्याने जाणीव नाही ठेवली. असो हा एक भाग...  पण आज सचिन क्रिकेट विश्वातून निवृत्त होऊनही सर्वांच्या मना मना मध्ये बसलेला आहे आणि तो शेवट पर्यंत तसाच राहील.  

कथा नंबर दोन :- 

अमेरिकेतील एक धनाढ्य श्री. रॉकफेलर हे एका हॉटेलमध्ये स्वस्त खोल्यांची चौकशी करत होते, 
तेव्हा हॉटेल चा मालक त्यांना म्हणाला, "आपल्या कंपनीमधील कारकुन सुद्धा आमच्या हॉटेलमध्ये महागड्या खोल्या घेऊन राहतात" यावर श्री. रॉकफेलर यांनी हॉटेल मालकाला म्हणुनच ते गरीब राहिले आहेत असे तत्काळ उत्तर दिले. 

यशस्वी उद्योजक कार्नेजी म्हणतात "सुखाचा व समृद्धीचा मुलमंत्र म्हणजे बचतीची सवय, पैसा, यश व स्वातंत्र्य या तिन्ही गोष्टी मिळवणे एकवेळ सोपे असते."

"थेंबे थेंबे तळे साचे...बचत से बरकत"... याचा विसर पडता कामा नये. 

समजा एखाद्या देशाची संख्या ८० कोटी आहे, त्या देशातील प्रत्येक नागरिकाने प्रत्येक दिवशी केवळ एक पैसा बचत करण्याचे ठरवले तरी महिन्याभरात ही रक्कम २४ कोटी तर वर्षा भरात ही रक्कम २८८ कोटी रुपये इतकी होईल. त्या देशाचा आर्थिक कायाकल्प घडून येईल.  

कथा नंबर तीन :-

"विश्वविख्यात कुबेर श्री. रॉकफेलर एकदा आपल्या तेल कारखान्यातून हिंडत होते. असेच फिरत असताना एका यंत्राजवळ ते थांबले. हे यंत्र तेलाच्या पिंपाची झाकणे सील करण्याचे काम करत होते. त्यासाठी यंत्रातुन प्रत्येक झाकणासाठी ४० थेंब रसायन वापरले जात होते, त्यांना ते थोडेशे जास्त वाटले, म्हणुन त्यांनी फोरमन ला बोलवले व झाकण बंद करण्यासाठी किती थेंबाची आवश्यकता आहे ते विचारले, त्याला नीट सांगता आले नाही. तेव्हा श्री रॉकफेलर यांनी स्वतः अभ्यास करून ३९ थेंबात हे काम होऊ शकेल असा निष्कर्ष काढला. त्याप्रमाणे त्यांनी ३९ थेंबच वापरण्याचे आदेश दिले. या एका थेंबाच्या बचतीतुन कारखान्याचे प्रतीवर्षी ८ लाख डॉलर्स वाचु लागले.   

कथा नंबर चार:-

"बाबा कैलाशनाथ एक सत्व पुरुष होते, आपल्या गावात एक देऊळ बांधावे असे त्यांना वाटले, गावातील प्रत्येक माणसांकडून त्यांनी १-१ पैसा मदत म्हणुन गोळा केला, आणि आज ते देवालय १ पैसा देवालय म्हणुन प्रसिद्ध आहे. याच पद्धतीने त्यांनी २ पैसा विद्यालय बांधून काढले," अशी आहे बचतीची किमया...

कोणी एका लेखकाने असे म्हंटले आहे की, 

"आकाशातील सर्वात उंच जागेवर बचत बँक हे शब्द फक्त 'दोन शब्द' सुवर्ण अक्षरात लिहून ठेवावेत. अल्पबचत म्हणजे केवळ धनसंचय नव्हे, तर फालतू आणि वाईट सवयींवरील खर्च यांना रजा देणे होय." 



कथा नंबर पाच:- 

" एकदा पंडीत मदनमोहन मालवीय बनारस विद्यापीठासाठी देणगी मागण्यासाठी म्हणुन एका श्रीमंत शेटजींकडे गेले. त्याचवेळी ते शेटजी आपल्या धाकट्या मुलाला काडीपेटीतील काड्या वाया घालवण्या वरून रागावत होते.

यावर हा चिक्कु गृहस्थ आपल्याला काय मदत देणार..? असा विचार पंडीत मालवीय यांच्या मनात येऊन गेला. 

थोड्यावेळाने शेटजींने पंडीत मालवीय यांना काय काम आहे असे विचारले, तेव्हा भीत भीत मालवीय म्हणाले "बनारस विद्यापीठासाठी (त्याच्या स्थापनेसाठी) काही देणगी आपणाकडून घ्यावी म्हणुन आलो होतो. परंतु परत केव्हा तरी येतो असे म्हणुन पंडीत निघायला लागले, यावर शेटजींनी त्यांना थांबवले व आपल्या मुलास चेकबुक आणायला सांगितले.

चेकबुक आणल्यानंतर त्यांनी आपल्या खात्यातुन "पाच हजार" रुपयांचा धनादेश पंडीत मालवीय यांच्या हातात दिला. 

त्यांची ती उदार देणगी पाहुन पंडीत मालवीय यांना राहवले नाही व त्यांनी शेटजींनी विचारले की आत्ताच तुम्ही आपल्या मुलाला काडीपेटीतील काड्या वाया घालवण्यावरून ओरडत होतात. चेक देण्याची आपली ही वृत्ती पूर्वीच्या वृत्तीशी विसंगत नाही का वाटत...? त्यावर शेटजी हसत हसत उदगारले, 

"काटकसर म्हणजे चिक्कु पणा नव्हे, तर योग्य कारणासाठी योग्य ठिकाणी योग्य पैसा खर्च करणे होय."

पंडीत मालवीय त्यांच्याकडे बघतच राहिले त्या दिवशी ते आयुष्यातील सर्वात मोठा धडा शिकले. की...

"शुल्लक गोष्टीतुन जे पुर्णत्व प्राप्त होते ते कधीच पुर्ण नसते." पैशांचे रक्षण आपण केले तो आपले रक्षण करतो."

                                                  !! "अर्थो रक्षति रक्षित:" !!                    

ब्रेन्जामीन फ्रॅक्लीन म्हणतात, "आपण आपल्या उत्प्नाना पेक्षा कमी खर्च करत असाल तर खुशाल असे समजा की आपल्याजवळ पारसमणी आहे." तारुण्यात बहुतेक लोक चैन, एषाराम व उधळपट्टी करतात. बचत, काटकसर या शब्दांची टवाळी करतात, याउलट विचारी आणि सयंमी माणसाचे वर्णन कसे असते ते पहा.

      
कथा नंबर सहा :-

"एका माणसाला सोन्याचे घड्याळ विकत घेण्याची इच्छा होती. तो आपल्या दुपारच्या जेवणावर ५० सेंट खर्च करीत असे. त्याने २५ सेंट खर्च करण्याचा संकल्प केला. ६ महिन्यात त्याच्याकडे घड्याळ खरेदी करण्याइतपत रक्कम जमा झाली, तेव्हा मित्राने त्याला विचारले  की अरे पैसे तर जमा केलेस मग तू अजुन तू घड्याळ का खरेदी केले नाहीस..?

यावर तो म्हणाला आत्ता माज्या मनात एक वेगळाच विचार चालु आहे. जर मी ५० सेंट एवजी २५ सेंट मध्येच माजा भोजनाचा प्रबंध करू शकतो तर सोन्याचे घड्याळ न घेताही माझे काम चालु शकते. त्यामुळे मी ही केलेली बचत माज्या भविष्यकालीन ऐश्वर्याची आधारशीला ठरणार आहे. मी आत्ता या बचतीतून सुंदर वास्तु बांधणार आहे."

कथा नंबर सात:-

ब्रेन्जामीन फ्रॅक्लीनच्या दुकानासमोर एक मनुष्य बराच  वेळ फालतु चौकशी करत हिंडत होता, शेवटी त्याने विचारले की या पुस्तकाची किमंत काय..?? विक्रेता म्हणाला आहे, १ डॉलर, "पण तुम्हाला पडतील २ डॉलर, " त्यावर तो म्हणाला तुज्या मालकांना बोलव मी त्यांची भेट घेऊ इच्छितो." 

यावर श्री. फ्रॅक्लीन आपले काम सोडून आले. ग्राहकाने त्यांनाही विचारले की आपण हे पुस्तक कमीत कमी केवढ्याला द्याल..?"

  
ब्रेन्जामीन फ्रॅक्लीन म्हणाले ३ डॉलर, 

मनुष्य म्हणाला "पण आत्ताच आपल्या नोकराने किमंत दोन डॉलर सांगितली." 

बरोबर आहे आपण त्याचा जो वेळ घेतला त्याचा त्याने १ डॉलर ज्यादा सांगितला आणि माज्या वेळेबद्दल १ डॉलर. तो तरुण काय समजायचा ते समजला...


 शेवटची गोष्ट :-                                   

"एकदा एक राजा बुद्धिबळ खेळत होता. एक शेतकरी त्याच्याकडे मदत मागायला आला. राजा म्हणाला बोल किती पैसे देऊ ..? त्यावर तो चतुर शेतकरी म्हणाला "बुद्धिबळाच्या पहिल्या घरावर एक रुपया, दुसऱ्या घरावर त्याच्या दुप्पट, तिसऱ्या घरावर दुसऱ्याच्या दुप्पट अशा प्रकारे ६४ व्या घरावर पैसे ठेवा व मला द्या." राजाला वाटले काय किरकोळ मागणी आहे," परंतु यावर राजाने अंमल केले असता त्याचा संपुर्ण खजिना रिकामा झाला तरी तो शेतकऱ्याची मागणी पुर्ण करू शकला नाही."

विचार करा आणि लक्षात ठेवा. 


                                        "वेळ किवां पैसा विनाकारण खर्च करणे 
                                       म्हणजे दिलेले जीवन व्यर्थ घालवणे होय."

"जीवनामध्ये सुख व समृद्धीच्या मार्गावरून तुम्हाला चालायचे असेल तर थेंबे थेंबे तळे साचे... हा सुखाचा मुलमंत्र लक्षात ठेवा.


छोट्या छोट्या गोष्टींनीच मोठी मोठी कार्ये पार पडतात, तेव्हा लक्षात ठेवा परमाणु पासुनच परमाणु बॉम्ब बनतो. 

Monday, 18 September 2017

3 NEW INTELLIGENT STORIES FROM SERIES OF THINK DIFFERENT

THE THREE STORIES ARE
1. COMFORT ZONE
2. Bridge that keep you stable in LIFE
3. LIFE IS BEAUTIFUL

19th UPDATE TO THE BLOG REVOLUTION OF THOUGHTS
18.09.2017

STORY NO. 1 COMFORT ZONE



We want to achieve everything desired and all want to succeed in life but only few achieved and succeed. Why not the rest..?


We all know that EFFORTS bring RESULTS. Majority do efforts, but limited to our COMFORT ZONE.

Thus its RESULTS too are normal.

Extraordinary RESULTS are achieved by those who step out Comfort Zone.

Comfort Zone is a psychological state in which a person feels familiar, at ease, in control and experiences low anxiety. In Comfort Zone we feel there we'll have access to enough love, food, talent, time, admiration, rest, security, pleasure and there will be least risk. Outside Comfort Zone we feel uncomfortable, insecure, uncertain and vulnerable, Thus majority don't cross the comfort line. Outside there is opportunity in adversity.

Those who take the risk and cross Comfort line, have been great achievers. Science has proved that a level of anxiety pushes up your performance. It is outside the Comfort Zone that the magical zones lies. This magical Zone is full of extraordinary performance, effort enhancing anxiety, thrill, beyond happiness, unthinkable fields to achievement. 

Tips to go beyond Comfort Zone:

1. Don't be afraid:
    Don't have a fear of change in place or things or about opportunities in your life around you
    just overcome the fear and you will be blessed.

2. What would others think:
    One of the biggest thing many of us holds many of us back is our fear of what people think.
    Do something you normally wouldn't do for fear of looking like and idiot. BE that idiot.

3. Don't be ashamed of failure:
    Know that worst thing that can happen when you try something new is that you might you 
    fail. 

4. Face your fears:
    Little fearful things could turn into adventures or funny stories if you allow yourself to deal 
    with a little discomfort.  

5. Enjoy the unknown:
    Every change, opportunity is to enjoy, adopt, learn something new, challenging so enjoy it,
    experience it and feel it.



Most of the greatest lessons in life are learned by taking risk and most of the extraordinary achievements are made by living outside your Comfort Zone. Knowing that you can't change people, places or things, but can change the way you respond to these things gives you the confidence and power to accept and engage in this diverse  world we live in.



"Everything you want in Life is waiting for you Outside of your Comfort Zone and you just need to make move."

STORY NO. 2 Bridge that keep you stable in LIFE

Father is flying a kite and his son watching him carefully. After some times son says " Dad, because of the string the kite is not able to go any further higher."

Hearing this, the father smiles and breaks the string.

The kite goes higher after breaking of the thread and then shortly after that it comes and falls on the ground.

The child is very dejected and sad.

The father sits next to him and calmly explains:
"Son, in life we reach a certain level of prosperity and then we feel that there are certain things in our life that are not letting us grow any further like Home, Family, Culture, Friendship etc. We feel we want to be free from those strings which we believe are stopping us from going higher."

"But remember son. Going higher is easier than staying at the higher level."

"AND friends, family, culture etc are things that will help us stay stable at the high heights that we achieved. If we try to break away from those strings our condition will be similar to take kite."



Moral
"Never go away from culture, family, friends and relationships as they help keep us stable while you are flying high."

STORY NO. 3 Life is Beautiful



Life is Beautiful stay connected. 

There were about 70 scientists working on a very hectic project. All of them were really frustrated due to the pressure of work and the demands of their boss but everyone was loyal to him and did not think of quitting the job. 

One day, one scientist came to his boss and told him - Sir, I have promised to my children that I will take them to the exhibition going on in our township. So I want to leave the office at 5:30 PM.

His boss replied "OK, You're permitted to leave the office early today."

The Scientist started working. He continued his work after lunch. As usual he got involved to such an extent that he looked at his watch when he felt he was close to completion. The time was 08:30 PM. Suddenly he remembered the promise he had given to the children. 

He looked for his boss, He was not there. Having told him in the morning itself. he closed everything and left for home. 

Deep, within himself, he was feeling guilty for having disappointed his children. He reached home children were not there. His wife alone was sitting in the hall and reading magazines.

The situation was explosive, any talk would boomerang on him. His wife asked him "Would you like to have coffee or shall I straight away serve dinner if you are hungry. 

The man replied "If you would like to have coffee, i too will have but what about Children ?? "

Wife replied "You don't know?? Your manager came here at 5.15 PM and has taken the children to the exhibition.

The boss does not have to do it every time. But once it is done loyalty established. That is why all the Scientist at Thumba continued to work under their boss even though the stress was tremendous.

By the way, can you guess as who the boss was...???

He was none other than Dr. APJ Abdul Kalam, Ex-President of India.

Thursday, 2 June 2016

YOUR TIME WILL COME


Date:- 02.06.2016





Kenya is two hours ahead of Nigeria, but it does not mean that Nigeria is slow, and it does not mean that Kenya is faster than Nigeria. Both countries are working based on their own "Time Zone."

Some one is still single..Someone got married and 'waited' ten years before having a child, there is another who had had a baby within one year after marriage.

Someone graduated at the age of 22, yet waited 5 years before securing a job; and there is another who graduated at the age of 27 and secured employment just after national service.

Joyce Meyer started her own ministry at age 41 and still alive today at 71 years old.

Someone became CEO at the age of 25 and died at the age of 50 while another became a CEO at the age of 50 and lived to 90 years.

Everyone worked based on their 'Time Zone'..
Some people have everything that work fast for them. Work in your “time zone”.

Colleagues, friends, associates, younger one(s) might "seem" to go ahead of you. Don't envy them, it's their 'Time Zone.'. Yours is coming soon. Hold on, be strong, and stay true to yourself. All things shall work together for your good. You’re not late… you’re on time!