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Sunday, 11 February 2024

संतान - सुख, सुरक्षा उसका चरित्र और मनुष्य के कर्म भाग -२


                   संतान - सुख, सुरक्षा उसका चरित्र और मनुष्य के कर्म

                                                                    श्री कृष्ण सार 

                  श्री कृष्णके मधुर बोल एवम वचन - SHREE KRISHNA SEEKH भाग -

                            संतान - सुख, सुरक्षा उसका चरित्र और मनुष्य के कर्म

  !! संतानो के भविष्य को सुख से भरणे का प्रयत्न करना यही हर माता- पिता का प्रथम कर्तव्य होता है !!

!! जिन्हें आप इस संसार में लाये, और जिनके कर्मो से ये जगत आपक भी परिचय पायेगा भविष्य में उनके               भविष्य कि सुख कि योजना करणे से अधिक महत्व और हो भी क्या सकता है !!

                                  किंतु सुख और सुरक्षा क्या ये मनुष्य के कर्म से प्राप्त नही होते. ?


माता - पिता के दिये हुए अच्छे या बुरे संस्कार, उनकी दि हुई योग्य अथवा अयोग्य शिक्षा क्या आज के सारे कर्मो का मोल नही.

                                         संस्कार और शिक्षा से बनता है मनुष्य का चरित्र.

                                                                    अर्थात 


!!! माता - पिता अपने संतानो का जैसा चरित्र बनाते है, वैसा ही बनता है उनका भविष्य, किंतु फिर भी अधिकतर माता- पिता अपनी संतानो का भविष्य सुरक्षित करने कि चिंता में उनका चरित्र निर्माण का कार्य भूल ही जाते है. !!!

                                                                    वस्तुतः 

!! जो माता- पिता अपने संतानो कि भविष्य कि चिंता करते है !! उनकी संतानो को कोई लाभ नही होता. !! किंतु जो माता- पिता अपने संतानो के भविष्य का नही उनके चरित्र का निर्माण करते है !! ऊन संतानो कि प्रशस्ती समस्त संसार करता है !!


                                                  !!! स्वयंम विचार किजीये !!!


मुझे नयी धारावाहिक स्टार प्लस पर नये सिरे से प्रसारित कि गई महाभारत गाथा और इसमे से सारे पात्र उनके संघर्ष कि कहाणी पुन्हा पुन्हा सुनने का अवसर मिला. 

श्री. कृष्ण भगवान (सौरभ जैन जी उनका एक यादगार अजरामर किरदार ) उनके इस किरदार ने मुझपर कुछ ऐसा असर किया  कि मैने सारे महाभारत के एपिसोड पुन्हा पुन्हा सुनकर उसमे से मेरे सबसे अधिक प्रिय पात्र श्री. कृष्ण भगवान के लगभग सारे डायलॉग एक डायरी में लिख लिये ताकी जब भी कभी मुझे अकेलापण महसूस हो, मेरी सोच  नकारात्मकता से भर जाये तब मे श्री. कृष्ण भगवान के इन्ही मधुर बोल एवंम वचन को पढकर पुन्हा मेरी उर्जा एक जगह केंद्रित करके मेरे जीवन का लक्ष्य हासील कर सकू.  

बस यही विचार के साथ मेने मेरे अपने डायरी में लिखे वो सारे डायलॉग जो कि स्टार प्लस (Star plus) और  डिस्ने +  हॉट स्टार (Dinsey + Hotstar) पर १६ सप्टेंबर २०१३ से १६ ऑगस्ट २०१४ में प्रदर्शित कि गयी महाभारत  गाथा कि पेशकश हे उन्हे यहा पर पुन्हा एक बार जैसे शब्द है वैसे ही लिखणे कि कोशिश कि है.

सिद्धार्थ कुमार तिवारी और अन्य लिखित, अमोल सुर्वे, सिद्धार्थ कुमार आनंद और अन्य द्वारा निर्देशित ये श्री. व्यास जीं कि महाभारत गाथा के श्री कृष्ण भगवान के मुख से निकले कुछ सवांद आपके लिये.  

NO COPYRIGHT INFRIDGEMENT INTENDED. THE CLIPS, CONTENT AND AUDIO CREDIT GOES TO THEIR RESPECTIVE OWENRS. WE USED HERE FOR MOTIVATION KNOWLEDGE, SPRITUALITY PURPOSE.

Tuesday, 24 October 2023

क्या इच्छा, आशा, अपेक्षा, आकांशा यही सब मानव समाज के चालक होते है ?

 

                                                                  श्री कृष्ण सार 

                                     श्री कृष्णके मधुर बोल एवम वचन - भाग -१

                इच्छा, आशा, अपेक्षा, आकांशा यही सब मानव समाज के चालक होते है ! 

                                                                    नही ?


                                               यदि कोई आप से पुछे, की आप कौन है ? 

                                                       तो आपका उत्तर क्या होगा ..?

                     आप तुरंत ही ये  जान जाएगें की आपकी इच्छाये ही आपके जीवन कि व्याख्या है.

                   कुछ पाने से मिली सफलता कुछ ना पाने से मिली निष्फलता ही आपका परिचय है 

अधिकतर लोग ऐसे जीते है, की स्वयंम भीतर से मरते रेहते है लेकिन अपनी इच्छाओ को नही मार पाते.

                        इच्छाए उन्हें दोडाती है, जिस प्रकार म्रिकृष्णा मृग को दौड़ाती है।  

                                परंतु इन्ही इच्छाओ कि गर्भ में ज्ञान का प्रकाश भी है. 

                                                                    कैसे ..?

जब इच्छाये अपूर्ण रहती है, तुटती है, तब वहिसे ही ज्ञान की किरण प्रवेश करती है मनुष्य के हृदय में.

                                                                     ना

                                                            ये कथा नहीं है 

                                                 केवल इच्छाओं के संघर्ष की, 

                नही है केवल महत्वाकांशाओ से जन्म लेने वाले भयावह रक्तपात की, ये कथा है, 

                                        इच्छाओं के गर्भ से उदित होते हुए ज्ञान की।

                 
                        मै वासुदेव कृष्ण आप सभी को निमंत्रण देता हूँ। इस यात्रा पे चलने का.

                                जीवन का मर्म सिखायेगी, मनुष्य का धर्म सिखाएगी, 

                                   किचड से उठकर कमल बनने का कर्म सिखाएगी. 


                                                    और इस यात्रा का नाम 

                                                        !!! "महाभारत" !!!


मुझे नयी धारावाहिक स्टार प्लस पर नये सिरे से प्रसारित कि गई महाभारत गाथा और इसमे से सारे पात्र उनके संघर्ष कि कहाणी पुन्हा पुन्हा सुनने का अवसर मिला. 

श्री. कृष्ण भगवान (सौरभ जैन जी उनका एक यादगार अजरामर किरदार ) उनके इस किरदार ने मुझपर कुछ ऐसा असर किया  कि मैने सारे महाभारत के एपिसोड पुन्हा पुन्हा सुनकर उसमे से मेरे सबसे अधिक प्रिय पात्र श्री. कृष्ण भगवान के लगभग सारे डायलॉग एक डायरी में लिख लिये ताकी जब भी कभी मुझे अकेलापण महसूस हो, मेरी सोच  नकारात्मकता से भर जाये तब मे श्री. कृष्ण भगवान के इन्ही मधुर बोल एवंम वचन को पढकर पुन्हा मेरी उर्जा एक जगह केंद्रित करके मेरे जीवन का लक्ष्य हासील कर सकू.  

बस यही विचार के साथ मेने मेरे अपने डायरी में लिखे वो सारे डायलॉग जो कि स्टार प्लस (Star plus) और  डिस्ने +  हॉट स्टार (Dinsey + Hotstar) पर १६ सप्टेंबर २०१३ से १६ ऑगस्ट २०१४ में प्रदर्शित कि गयी महाभारत  गाथा कि पेशकश हे उन्हे यहा पर पुन्हा एक बार जैसे शब्द है वैसे ही लिखणे कि कोशिश कि है.

सिद्धार्थ कुमार तिवारी और अन्य लिखित, अमोल सुर्वे, सिद्धार्थ कुमार आनंद और अन्य द्वारा निर्देशित ये श्री. व्यास जीं कि महाभारत गाथा के श्री कृष्ण भगवान के मुख से निकले कुछ सवांद आपके लिये.  

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Thursday, 30 July 2020

गोष्ट सहनशीलता आणि सहिष्णुतेची


गोष्ट सहनशीलता आणि सहिष्णुतेची

मस्त गोष्ट आहे कदाचित तुमच्या ऐकण्यात किंवा वाचनात आली असेल...




एका बेडकाला कोमट पाण्यात ठेवण्यात आले. अपेक्षा होती की बेडूक टुणकन उडी मारून बाहेर येईल.

पण तसे काही झाले नाही. मग हळू हळू ते पाणी गरम करण्यात येऊ लागले.

जसजसे पाण्याचे तापमान वाढू लागले, आतातरी बेडूक टुणकन उडी मारून बाहेर येईल असे वाटू लागले. पण तसे काही घडेना

शेवटी पाणी उकळू लागले तरी पण बेडूक बाहेर येईना. शेवटी त्या बेडकाला जेव्हा उकळत्या पाण्यातून बाहेर काढले तेव्हा तो बेडूक मेलेला आढळला.

तुम्हाला वाटेल की बेडूक उकळत्या पाण्यामूळे भाजून मेला.

पण तसे नव्हते...!!!



पाण्याच्या तापमानाप्रमाणे आपल्या शरीराचे तापमान ऍडजेस्ट करायची एक खास देणगी बेडकाला मिळाली आहे.

कारण बेडूक ज्या पाण्यात रहातो त्याचे तापमान नेहमीच कमी जास्त होत असते. बेडकाला कोमट पाण्यात टाकल्यावर बेडकाने आपल्या शरीराचे तापमान पाण्याच्या तापमानाप्रमाणे ऍडजेस्ट करायला सुरवात केली.

पुढे जस जसे पाण्याचे तापमान वाढू लागले बेडकाने तोच प्रयोग चालु ठेवला. पण यामध्ये बेडकाची बरीच ताकद खर्च झाली.

ज्यावेळी पाणी उकळू लागले व बेडकावर टुणकन उडी मारून पाण्याबाहेर पडण्याची वेळ आली तेव्हा उडी मारायला बेडकाकडे ताकदच शिल्लक राहीली नाही.

त्यामुळे बेडकावर मरण ओढवले. जर ज्या वेळी ताकद होती त्यावेळी बेडूक उडी मारून बाहेर पडला असता तर नक्कीच वाचला असता.

आपले पण असेच असते. आपण अनेकवेळा संकटे, अडथळे, अडचणी, दुःख, उदासीनता, स्वप्नभंग, निराशा यामूळे वेढले गेलेलो असतो. तसेच आपल्याला पुष्कळवेळा आपल्याला कमी लेखणारी, आपला अपमान करणारी, आपले शारिरीक, मानसीक, भावनीक व आर्थिक शोषण करणारी माणसे भेटत असतात.

अशा परिस्थितीला व माणसांना तोंड देण्यासाठी निसर्गाने आपल्याला एक आगळी वेगळी शक्ती बहाल केली आहे. ती म्हणजे सोशीकता, सहन करण्याची ताकद किंवा सहिष्णुता. आपण नेहमीच आलेल्या परिस्थितीला ऍडजेस्ट व्हायचा प्रयत्न करत असतो.

उगीच कशाला वाकड्यात शिरायचे...; म्हणून आपल्याला जी वेडी- वाकडी माणसे भेटत असतात, त्यांच्याशी पण आपण ऍडजेस्ट करायचा प्रयत्न करत असतो.

खरे म्हणजे यातून लवकर सुटका कशी करून घेता येईल याचे मार्ग आपल्याला दिसत असतात व समजत पण असतात. पण सहिष्णुतेच्या नावाखाली आपण याकडे दुर्लक्ष करत असतो.

पण यामध्ये आपली बरीच ताकद खर्च होत असते हे आपल्याला कळत नसते. पण जेव्हा डोक्यावरून पाणी वाहू लागते व यातून आपली सुटका करून घेण्याची वेळ येते तेव्हा सुटका करून घेण्यासाठी लागणारी ‘एनर्जी’ च आपल्याकडे शिल्लक रहात नाही.

आपण मग त्यात कायमचे अडकून पडतो व "दैवाला" दोष देण्यापलीकडे फारसे काही करू शकत नाही.

सहनशिलता किंवा सहिष्णुता हा चांगला गुण आहे पण त्याचा अतीरेक झाला तर तो दुर्गुणच ठरतो.

गुणांचे सद्गुण व दर्गुण असे दोन प्रकार आहेत. पण अनेक वेळा दुर्गुण हे सद्गुण ठरत असतात; तर सद्गुण हे दुर्गुण ठरत असतात.

तुम्ही कोणालाही तुमचे शारिरीक, मानसीक, भावनीक व आर्थिक शोषण करू देऊ नका.

पाणी गरम होत असताना जोपर्यंत आपल्याकडे उडी मारून बाहेर पडण्याची ताकद आहे तोपर्यंत उडी मारून बाहेर पडणे शहाणपणाचे ठरते.

तात्पर्य : तुमच्याकडे असलेल्या सहनशीलतेचा किंवा सहिष्णुतेचा उपयोग कसा करायचा हे तुमचे तुम्हीच ठरवायचे

कावळ्याची गोष्ट माणुसकी शिकवणारी


कावळ्याची गोष्ट माणुसकी शिकवणारी




सुंदर बोधकथा आहे,

आवडल्यास
इतरांनाही सांगावी अशी .....

एक दिवस एक कावळा आणि त्याचा मुलगा झाडावर बसले होते.
कावळ्याचा मुलगा वडिलांना म्हणाला "मी आजपर्यंत सगळ्या प्रकारचे मांस खाल्ले... पण, दोन
पायांच्या माणसाचे मांस कधीच खाल्ले नाही.बाबा, कसा स्वाद असतो हो या दोन पायांच्या जीवाच्या मांसाचा?"

वडील कावळा म्हणाला "आजपर्यंत मी जीवनात ३ वेळा माणसाचे मांस खाल्ले आहे. खूपच चविष्ट असते ते!"
मुलगा कावळा लगेच हट्ट करू
लागला कि त्याला पण माणसाचे मांस खायचे आहे.
वडील कावळा म्हणाला, "ठीक आहे, पण थोडा वेळ वाट पहावी लागेल आणि मी जसे सांगेन तसे
तुला करावे लागेल. माझ्या वाडवडिलांनी मला हि चतुराई शिकवून ठेवली आहे ज्यामुळे आपल्याला खाणे मिळू शकेल." मुलगा कावळा "होय" म्हणाला.
त्यानंतर वडील कावळ्याने
मुलाला एका जागी बसवले व तो उडून निघून गेला आणि परत येताना मांसाचे २ तुकडे तोंडात
घेवून आला. एक तुकडा स्वतःच्या तोंडात धरला व दुसरा तुकडा मुलाच्या तोंडात दिला,
तुकडा तोंडात घेता क्षणी मुलगा म्हणाला, "शी बाबा, तुम्ही कसल्या घाणेरड्या चवीचे मांस
आणले आहे. असले खाणे मला नको."
वडील कावळा म्हणाला, "थांब,
तो तुकडा खाण्यासाठी नसून फेकण्यासाठी आहे. हा एक तुकडा टाकून आपण आता मांसाचे ढीग
तयार करणार आहोत. उद्या पर्यंत वाट बघ. तुला मांसच मांस खायला मिळेल आणि ते
सुद्धा माणसाचे."
मुलाला हे काही कळले नाही कि एका मांसाच्या तुकड्यावर मांसाचे ढीग कसे काय निर्माण होणार ?
पण त्याचा त्याच्या वडिलावर विश्वास होता. थोड्या वेळाने कावळा वडील एक तुकडा घेवून
आकाशात उडाला आणि त्याने
तो तुकडा एका मंदिरात टाकला आणि परत येवून दुसरा तुकडा उचलला व तो दुसरा तुकडा एका मशिदीच्या आत टाकला.

मग तो झाडावर येवून बसला.
वडिल कावळा मुलाला म्हणाला, "आता बघ उद्या सकाळपर्यंत मांस खायला मिळते कि नाही ते?"

थोड्याच वेळात सगळीकडे गलका झाला, ना कुणाला कुणाचे ऐकू येत होते, ना कोणी कोणाचे ऐकून घेत होते.

फक्त धर्म भावना विखारी झाली होती. धर्माच्या नावाखाली रक्ताच्या चिळकांड्या उडत
होत्या.... आई, मुलगा, बहिण, भाऊ, वडील, काका, शेजारी, मित्र असे कोणतेच नाते लक्षात न घेत फक्त धर्म बघून एकमेकांवर वार चालू होते.

आमच्या धर्माचा अपमान
झाला त्याचा बदला घेतलाच पाहिजे असे दोघेही म्हणत होते आणि यात निरपराध मारले जात
होते.

खूप वेळ यातच निघून गेला आताशा गाव शांत होवू लागले होते कारण रस्त्यावर फक्त आणि फक्त रक्तच सांडलेले दिसत होते. विशेष म्हणजे ते रक्त लाल रंगाचे
होते... त्यात कुठल्याच धर्माची छटा नव्हती. ते फक्त एकच धर्म पाळत होते ते म्हणजे प्रवाही पणाचा..

गांव निर्मनुष्य भकास झाले होते.... सर्वत्र भयाण शांतता पसरली होती.
या धुमश्चक्रीतून फक्त २ जीव सुटले होते ते म्हणजे झाडावरचे कावळे.
आता कावळ्याचे पोर माणसाची शिकार करायला शिकले होते.

कावळ्याच्या पोराने बापाला प्रश्न विचारला,
"बाबा, हे असेच नेहमी होते का?
आपण भांडणे लावतो आणि माणसाच्या लक्षात कसे येत नाही?"

कावळा म्हणाला, "अरे या मुर्ख माणसाना कधीच आपला धर्म कळला नाही. माणुसकी हा धर्म सोडून ते नको त्या गोष्टी करत बसले आणि आपल्यासारखे कावळे त्यांचा फायदा घेवून जातात, हे त्यांच्या लक्षातही येत नाही.
माणूस म्हणून जगण्यापेक्षा यांनी जात आणि धर्म यांचेच जास्त प्रस्थ माजविले आहे.आणि त्याचा गैरफायदा इतर तिसरे कोणी तरी घेवून जातात."
इतके बोलून दोघे बाप-लेक मांस खाण्यासाठी उडून
गेले.

Saturday, 21 April 2018

थेंबे थेंबे तळे साचे सुखाचा मुलमंत्र वाचाच एकदा ...

दिनांक :- २१.०४.२०१८

थेंबे थेंबे तळे साचे सुखाचा मुलमंत्र वाचाच एकदा ...
काही छोट्या छोट्या गोष्टींच्या स्वरूपात:-



कथा नंबर एक:-

"सुप्रसिद्ध कारखानदार हेन्री फोर्ड" यांच्या घरातील भिंतीवर एक फोटो होता, त्यात ते एका गरीब व्यक्तीला आलिंगन देत आहेत असे दृश्य होते. बरेच दिवस हा फोटो त्यांच्या घरात पाहिल्यानंतर एक दिवस त्यांच्या चिटणीसाने त्यांना सर ही फोटोतील व्यक्ती कोण आहे ? असे विचारले.

त्यावर हेन्री फोर्ड म्हणाले हा माजा वर्गमित्र आहे. 

यावर आश्चर्य चकित होऊन चिटणीसाने पुन्हा विचारले... मग सर दोघांमध्ये एवढा फरक कसा..??

त्यावर हेन्री फोर्ड म्हणाले "आम्ही दोघांनी कमाईस एकत्रच सुरुवात केली. त्याने मात्र कमाई पेक्षा जास्त खर्च करायला सुरुवात केली. तर मी त्याच दिवसापासून "थोडी-थोडी बचत करायला सुरुवात केली." 

आज साध्या असेच एक उदाहरण आपल्याला आपल्या भारत देशात पाहायला मिळते. भारताचा लिटील मास्टर सचिन तेंदुलकर आणि एक उत्कृष्ट क्रिकेट पटू न बनू शकलेला त्याचाच एक वर्गमित्र विनोद कांबळी. दोघेही एकाच शाळेतील, एकाच वर्गातील दोघांचीही क्रिकेट उत्तम, मग असे काय झाले की विनोद कांबळी हा क्रिकेट पासुन दूर गेला....

एक वेळ तर अशी होती की त्याच्याकडे घर असुन सुद्धा घराचा मेंटेनन्स भरायला पैसे नव्हते आणि याउलट सचिन हा उत्तम क्रिकेट खेळतच गेला श्रीमंत तर झालाच पण प्रामाणिक पणा आणि नम्रपणाने त्याने सर्वांना आपलेसे केले. काहीजण तर असेही म्हणतात की विनोद कांबळी हा सचिन पेक्षा उत्तम क्रिकेट खेळायचा, विनोदही भारता साठी क्रिकेट खेळला पण प्रचंड ग्ल्यामर, पैसा पटकन आलेली श्रीमंती याने तो भुलला त्याला ते टिकवता आले नाही. अय्याशी, एशाराम अश्याने क्रिकेट पासुन तो दूर गेला आणि दोन मित्रांमध्ये खुप अंतर निर्माण झाले.

सचिन ने त्याला मदत केलेही पण त्याचीही त्याने जाणीव नाही ठेवली. असो हा एक भाग...  पण आज सचिन क्रिकेट विश्वातून निवृत्त होऊनही सर्वांच्या मना मना मध्ये बसलेला आहे आणि तो शेवट पर्यंत तसाच राहील.  

कथा नंबर दोन :- 

अमेरिकेतील एक धनाढ्य श्री. रॉकफेलर हे एका हॉटेलमध्ये स्वस्त खोल्यांची चौकशी करत होते, 
तेव्हा हॉटेल चा मालक त्यांना म्हणाला, "आपल्या कंपनीमधील कारकुन सुद्धा आमच्या हॉटेलमध्ये महागड्या खोल्या घेऊन राहतात" यावर श्री. रॉकफेलर यांनी हॉटेल मालकाला म्हणुनच ते गरीब राहिले आहेत असे तत्काळ उत्तर दिले. 

यशस्वी उद्योजक कार्नेजी म्हणतात "सुखाचा व समृद्धीचा मुलमंत्र म्हणजे बचतीची सवय, पैसा, यश व स्वातंत्र्य या तिन्ही गोष्टी मिळवणे एकवेळ सोपे असते."

"थेंबे थेंबे तळे साचे...बचत से बरकत"... याचा विसर पडता कामा नये. 

समजा एखाद्या देशाची संख्या ८० कोटी आहे, त्या देशातील प्रत्येक नागरिकाने प्रत्येक दिवशी केवळ एक पैसा बचत करण्याचे ठरवले तरी महिन्याभरात ही रक्कम २४ कोटी तर वर्षा भरात ही रक्कम २८८ कोटी रुपये इतकी होईल. त्या देशाचा आर्थिक कायाकल्प घडून येईल.  

कथा नंबर तीन :-

"विश्वविख्यात कुबेर श्री. रॉकफेलर एकदा आपल्या तेल कारखान्यातून हिंडत होते. असेच फिरत असताना एका यंत्राजवळ ते थांबले. हे यंत्र तेलाच्या पिंपाची झाकणे सील करण्याचे काम करत होते. त्यासाठी यंत्रातुन प्रत्येक झाकणासाठी ४० थेंब रसायन वापरले जात होते, त्यांना ते थोडेशे जास्त वाटले, म्हणुन त्यांनी फोरमन ला बोलवले व झाकण बंद करण्यासाठी किती थेंबाची आवश्यकता आहे ते विचारले, त्याला नीट सांगता आले नाही. तेव्हा श्री रॉकफेलर यांनी स्वतः अभ्यास करून ३९ थेंबात हे काम होऊ शकेल असा निष्कर्ष काढला. त्याप्रमाणे त्यांनी ३९ थेंबच वापरण्याचे आदेश दिले. या एका थेंबाच्या बचतीतुन कारखान्याचे प्रतीवर्षी ८ लाख डॉलर्स वाचु लागले.   

कथा नंबर चार:-

"बाबा कैलाशनाथ एक सत्व पुरुष होते, आपल्या गावात एक देऊळ बांधावे असे त्यांना वाटले, गावातील प्रत्येक माणसांकडून त्यांनी १-१ पैसा मदत म्हणुन गोळा केला, आणि आज ते देवालय १ पैसा देवालय म्हणुन प्रसिद्ध आहे. याच पद्धतीने त्यांनी २ पैसा विद्यालय बांधून काढले," अशी आहे बचतीची किमया...

कोणी एका लेखकाने असे म्हंटले आहे की, 

"आकाशातील सर्वात उंच जागेवर बचत बँक हे शब्द फक्त 'दोन शब्द' सुवर्ण अक्षरात लिहून ठेवावेत. अल्पबचत म्हणजे केवळ धनसंचय नव्हे, तर फालतू आणि वाईट सवयींवरील खर्च यांना रजा देणे होय." 



कथा नंबर पाच:- 

" एकदा पंडीत मदनमोहन मालवीय बनारस विद्यापीठासाठी देणगी मागण्यासाठी म्हणुन एका श्रीमंत शेटजींकडे गेले. त्याचवेळी ते शेटजी आपल्या धाकट्या मुलाला काडीपेटीतील काड्या वाया घालवण्या वरून रागावत होते.

यावर हा चिक्कु गृहस्थ आपल्याला काय मदत देणार..? असा विचार पंडीत मालवीय यांच्या मनात येऊन गेला. 

थोड्यावेळाने शेटजींने पंडीत मालवीय यांना काय काम आहे असे विचारले, तेव्हा भीत भीत मालवीय म्हणाले "बनारस विद्यापीठासाठी (त्याच्या स्थापनेसाठी) काही देणगी आपणाकडून घ्यावी म्हणुन आलो होतो. परंतु परत केव्हा तरी येतो असे म्हणुन पंडीत निघायला लागले, यावर शेटजींनी त्यांना थांबवले व आपल्या मुलास चेकबुक आणायला सांगितले.

चेकबुक आणल्यानंतर त्यांनी आपल्या खात्यातुन "पाच हजार" रुपयांचा धनादेश पंडीत मालवीय यांच्या हातात दिला. 

त्यांची ती उदार देणगी पाहुन पंडीत मालवीय यांना राहवले नाही व त्यांनी शेटजींनी विचारले की आत्ताच तुम्ही आपल्या मुलाला काडीपेटीतील काड्या वाया घालवण्यावरून ओरडत होतात. चेक देण्याची आपली ही वृत्ती पूर्वीच्या वृत्तीशी विसंगत नाही का वाटत...? त्यावर शेटजी हसत हसत उदगारले, 

"काटकसर म्हणजे चिक्कु पणा नव्हे, तर योग्य कारणासाठी योग्य ठिकाणी योग्य पैसा खर्च करणे होय."

पंडीत मालवीय त्यांच्याकडे बघतच राहिले त्या दिवशी ते आयुष्यातील सर्वात मोठा धडा शिकले. की...

"शुल्लक गोष्टीतुन जे पुर्णत्व प्राप्त होते ते कधीच पुर्ण नसते." पैशांचे रक्षण आपण केले तो आपले रक्षण करतो."

                                                  !! "अर्थो रक्षति रक्षित:" !!                    

ब्रेन्जामीन फ्रॅक्लीन म्हणतात, "आपण आपल्या उत्प्नाना पेक्षा कमी खर्च करत असाल तर खुशाल असे समजा की आपल्याजवळ पारसमणी आहे." तारुण्यात बहुतेक लोक चैन, एषाराम व उधळपट्टी करतात. बचत, काटकसर या शब्दांची टवाळी करतात, याउलट विचारी आणि सयंमी माणसाचे वर्णन कसे असते ते पहा.

      
कथा नंबर सहा :-

"एका माणसाला सोन्याचे घड्याळ विकत घेण्याची इच्छा होती. तो आपल्या दुपारच्या जेवणावर ५० सेंट खर्च करीत असे. त्याने २५ सेंट खर्च करण्याचा संकल्प केला. ६ महिन्यात त्याच्याकडे घड्याळ खरेदी करण्याइतपत रक्कम जमा झाली, तेव्हा मित्राने त्याला विचारले  की अरे पैसे तर जमा केलेस मग तू अजुन तू घड्याळ का खरेदी केले नाहीस..?

यावर तो म्हणाला आत्ता माज्या मनात एक वेगळाच विचार चालु आहे. जर मी ५० सेंट एवजी २५ सेंट मध्येच माजा भोजनाचा प्रबंध करू शकतो तर सोन्याचे घड्याळ न घेताही माझे काम चालु शकते. त्यामुळे मी ही केलेली बचत माज्या भविष्यकालीन ऐश्वर्याची आधारशीला ठरणार आहे. मी आत्ता या बचतीतून सुंदर वास्तु बांधणार आहे."

कथा नंबर सात:-

ब्रेन्जामीन फ्रॅक्लीनच्या दुकानासमोर एक मनुष्य बराच  वेळ फालतु चौकशी करत हिंडत होता, शेवटी त्याने विचारले की या पुस्तकाची किमंत काय..?? विक्रेता म्हणाला आहे, १ डॉलर, "पण तुम्हाला पडतील २ डॉलर, " त्यावर तो म्हणाला तुज्या मालकांना बोलव मी त्यांची भेट घेऊ इच्छितो." 

यावर श्री. फ्रॅक्लीन आपले काम सोडून आले. ग्राहकाने त्यांनाही विचारले की आपण हे पुस्तक कमीत कमी केवढ्याला द्याल..?"

  
ब्रेन्जामीन फ्रॅक्लीन म्हणाले ३ डॉलर, 

मनुष्य म्हणाला "पण आत्ताच आपल्या नोकराने किमंत दोन डॉलर सांगितली." 

बरोबर आहे आपण त्याचा जो वेळ घेतला त्याचा त्याने १ डॉलर ज्यादा सांगितला आणि माज्या वेळेबद्दल १ डॉलर. तो तरुण काय समजायचा ते समजला...


 शेवटची गोष्ट :-                                   

"एकदा एक राजा बुद्धिबळ खेळत होता. एक शेतकरी त्याच्याकडे मदत मागायला आला. राजा म्हणाला बोल किती पैसे देऊ ..? त्यावर तो चतुर शेतकरी म्हणाला "बुद्धिबळाच्या पहिल्या घरावर एक रुपया, दुसऱ्या घरावर त्याच्या दुप्पट, तिसऱ्या घरावर दुसऱ्याच्या दुप्पट अशा प्रकारे ६४ व्या घरावर पैसे ठेवा व मला द्या." राजाला वाटले काय किरकोळ मागणी आहे," परंतु यावर राजाने अंमल केले असता त्याचा संपुर्ण खजिना रिकामा झाला तरी तो शेतकऱ्याची मागणी पुर्ण करू शकला नाही."

विचार करा आणि लक्षात ठेवा. 


                                        "वेळ किवां पैसा विनाकारण खर्च करणे 
                                       म्हणजे दिलेले जीवन व्यर्थ घालवणे होय."

"जीवनामध्ये सुख व समृद्धीच्या मार्गावरून तुम्हाला चालायचे असेल तर थेंबे थेंबे तळे साचे... हा सुखाचा मुलमंत्र लक्षात ठेवा.


छोट्या छोट्या गोष्टींनीच मोठी मोठी कार्ये पार पडतात, तेव्हा लक्षात ठेवा परमाणु पासुनच परमाणु बॉम्ब बनतो. 

Tuesday, 3 May 2016

Kindness



"When man learns to respect even smallest being of creation, whether animal or vegetable, nobody has to teach him to love his fellow man. Compassion for animals is intimately connected with goodness of character, and it may be confidently asserted that he who is cruel to animals cannot be a good man."
By Albert Schweitzer